प्रिय ब्लॉगर मित्रो नमस्कार !
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कहीं पर कुछ भी |
हम लोग मंदिरों का महत्व समझते है ! यह वह स्थान होता है जहाँ हम लोग अकेले या समूह में भगवान् या अपने इष्ट देव का पूजन करते हैं ! एक आदर्श मंदिर की विशेषता होती है की वहां एक से अधिक लोगों का पूजा करना चाहिये एवं उसका एक निश्चित आकार होना चाहिए !
"हिन्दुओं के उपासनास्थल को मन्दिर कहते हैं। यह अराधना और पूजा-अर्चना के लिए निश्चित की हुई जगह या देवस्थान है। यानी जिस जगह किसी आराध्य देव के प्रति ध्यान या चिंतन किया जाए या वहां मूर्ति इत्यादि रखकर पूजा-अर्चना की जाए उसे मंदिर कहते हैं।"
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कहीं पर कुछ भी |
हम लोग देखते हैं की कोई भी व्यक्ति कहीं पर भी एक पत्थर या मूर्ती रख देता है और उस पर रोली या कोई लाल रंग लगा देता है और हम लोग उसे अपना भगवान मान कर पूजा करना शुरू कर देते है ! चाहे हमारे जाने के बाद वहां पर आवारा जानवर घूमें या असामाजिक तत्व बैठकर अपनी लीला दिखाएँ !
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कहीं पर कुछ भी |
मुझे ध्यान है की एक बार किसी व्यक्ति ने एक छोटे से चबूतरे पर एक सीमेंट की मूर्ती लगा दी थी ! कुछ दिनों के बाद किसी कारण से रात में वह मूर्ती खंडित हो गयी एवं इसी वजह से वहां पर साप्रदायिक दंगे भड़क गए! परिणाम स्वरूप चार व्यक्ति अस्पताल में थे एवं एक व्यक्ति भगवान को प्यारा हो गया !
इस प्रकरण पर मेरे अनुसार अगर वह मूर्ती किसी आवारा जानवर द्वारा तोड़ी गयी हो तब ? तब दोष किसका है ?
निश्चित तौर पर हम लोगों का दोष है जो आस्था में डूबकर
बिना सुरकछा और पवित्रता का ध्यान रखे कहीं पर भी भगवान को बैठा देते है !
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महाराज एक फोटू खिचवाय लियो |
एक बार अज्ञातवास के दौरान मैं भी एक ऐसे ही चबूतरे पर बैठा था और दूसरा व्यक्ति जो मेरे साथ ही बैठा था वो शायद वहां का कर्ता धर्ता था ! जब मैंने उससे वहां की सुरक्छा के वाबत पुछा तो वह मजाक में बोला की जो भगवान दूसरों की सुरक्छा करता है वो अपनी सुरकचा नहीं करेगा क्या ?
उसके इतना बोलते ही मुझे सोमनाथ मंदिर लूट प्रकरण याद आ गया जब विदेशी लुटेरे सोमनाथ मंदिर लूट रहे थे तब वहां पर मौजूद पुजारी जो संख्या में लुटेरों से तीन गुने थे वहां पर सोमनाथ भगवान् की मूर्ती के आगे इस आशा से दंडवत मुद्रा में लेटे थे कि भगवान अभी उठेंगे और लूटेरों का नाश करेंगे पर वहां ऐसा कुछ नहीं हुआ और लूटेरों ने अमूल्य संपत्ति तो लूटी ही साथ में उन पुजारियों का सर भी धड से अलग कर गए !
मेरा कहना है कि जब मंदिर में कोई कुत्ता घुस जाता है तब हम लोग बड़ी बहादुरी से उसे भगा देते है फिर उन लूटेरों को क्यों छोड़ दिया ?
खैर विषय पर आते हुए अंत में मेरा यही कहना है कि जब भी आप या हम कहीं पर आस्था के प्रतीकों की स्थापना करवाएं तब तब उन प्रतीकों की स्थापना से पहले उस जगह की पवित्रता और सुरक्छा का ध्यान पहले रखें !
धन्यवाद !
प्रचलित वैदिक पौराणिक देवों के अलावा गाँव में और गाँव की सीमा में स्थानीय देव भी होते हैं। उन्हे यही व्यवस्था प्रिय होती है। ग्रामीण देवता खुले में ही विराजते हैं। इसलिए आश्चर्य नहीं करना चाहिए।
ReplyDeleteदूसरी तरफ़ लोगों ने धंधा भी बना लिया। कहीं पर भी मूर्ति रख दी और एक देव स्थापित कर दिया।
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DeleteLalit Ji,
DeleteApke Vicharon se mai sahmat hoon lakin Jo sthaniya dev gaon ke bahar virajte hain, unki surakcha or Saf safai ka dhyan bhi gramin logon ke hi dvara rakha jata hai..
mera kahna bus itna hi hai ki jo bhi dharmik prateek hain unka rakh-rakhao or saf safai ka dhyan rakha jaye , visheshkar un logon ke dvara jinhone uski sthapana karvai hai ,,anyatha vah sthan astha ke prateek na bankar anya dharm valo ke liye majak ka patra ban jayenge ..
dhanyavad..
हिंदू धर्म में पूजा के नियम कायदे सख्त नहीं हैं...जिसका नतीजा है ये "कहीं पर कुछ भी" पूजा स्थल...हमारे धर्म में वृक्ष भी पूजे जाते हैं.....सो जहाँ एक लाल धागा बंधा दिखा...ईश्वर का वास हुआ समझो...फिर उसका मान सामान,सुरक्षा,स्वछता,पवित्रता का काम...खुद भगवान के जिम्मे...
ReplyDeleteबहुत बढ़िया पोस्ट श्रवण जी.
आभार.
अनु
Anu ji ! sabse pahle apka abhar jo apne is blog ko padha ..or apni rai di..
DeleteHindu dharm ka koi likhit sambidhan nahin hai jo ham usko follow karen..Pooja ke kai naye niyam samay ke anusar change hote rahte hain..
to ham kyon na is "kahin par kuch bhi" type pooja sthal sthapit karne ke niyam banayen jayen...
dhanyavad!
बहुत उपयोगी लेख ...
ReplyDeleteऐसी लेखनी की आवश्यकता है ...
Satish ji,
DeleteUtsahvardhan ke liye apka Hardik
Dhanyavad.
Very good writing and good photos. Which you mentioned in post it is all true. Thanks a lot.
ReplyDeleteThanks Surinder Sir,
ReplyDeleteFor Visiting my blog and for your Opinion about my post.